कथकली से फ्लेमेंको तक... डीपीएस बोकारो के ‘धरोहर’ में दिखा भारतीय और विदेशी नृत्य का अनूठा संगम


भारतीय शास्त्रीय एवं विदेशी नृत्य शैलियों की जुगलबंदी में दिखा पूरब-पश्चिम का अद्भुत मिलनकला की कोई सीमा नहीं होती। सीमाओं के पार भी यह सभी को एकसूत्र में बांधती है और हमें समृद्ध बनाती है। वस्तुतः, हमारी संस्कृति और हमारी कला हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है। इस संरक्षित व बरकरार रखना जरूरी है।' उक्त बातें बोकारो इस्पात संयंत्र की अधिशासी निदेशक (मानव संसाधन) एवं दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) बोकारो प्रबंधन समिति की प्रो-वाइस चेयरपर्सन राजश्री बनर्जी ने कहीं। शुक्रवार को डीपीएस बोकारो में चारदिवसीय सांस्कृतिक उत्सव धरोहर के समापन समारोह को वह बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रही थीं। इस उत्सव का समापन अंतर-सदन नृत्य प्रतियोगिता के साथ हुआ। मुख्य अतिथि ने विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए ऐसे आयोजनों के लिए विद्यालय के प्राचार्य डॉ. ए. एस. गंगवार सहित पूरे स्कूल परिवार को बधाई दी। उन्होंने इन कार्यक्रमों को कला-संस्कृति के संरक्षण में सहायक बताया। सुश्री बनर्जी ने कहा कि विद्यालय भविष्य-निर्माण का आधारस्तंभ है और बच्चे यहां मिल रहे अवसरों का लाभ लेकर अपनी प्रतिभा को निखारें। परीक्षा में अच्छे अंक ही जीवन का ध्येय नहीं, जीवन को आनंदित भाव से जिएं। तनावमुक्त जीवन के लिए कला-संगीत काफी महत्वपूर्ण है। 

पारंपरिक और शास्त्रीय कथकली नृत्य ने बांधा समां 

इसके पूर्व, आरंभ में उन्होंने प्राचार्य एवं अन्य वरीय शिक्षकों के साथ मंगलदीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का उद्घाटन किया। विद्यालय के प्राचार्य डॉ. ए. एस. गंगवार ने कहा कि धरोहर उत्सव ने हमारे बच्चों को न केवल अपनी जड़ों से जोड़े रखा, बल्कि उन्हें एक वैश्विक दृष्टिकोण भी प्रदान किया है। विद्यार्थियों के समग्र विकास हेतु विद्यालय उनके भीतर छिपी कलात्मक प्रतिभा, अनुशासन और वैचारिक विस्तार को भी पूरी मुखरता से मंच प्रदान करता है। इस क्रम में प्राचार्य ने मुख्य अतिथि को शॉल ओढ़ाकर तथा स्मृतिचिह्न भेंटकर सम्मानित भी किया। अनूठी और रोमांचक अंतर-सदन नृत्य प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने भारतीय शास्त्रीय नृत्यकला के साथ-साथ दुनिया के विभिन्न देशों की पारंपरिक नृत्य शैलियों का ऐसा सम्मोहक सम्मिश्रण प्रस्तुत किया, जिसे देखकर दर्शक और निर्णायक मंडल मंत्रमुग्ध रह गए। पूरब और पश्चिम की नृत्यशैली की इस अनूठी जुगलबंदी को सभी ने सराहा और पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। मनोरम मंच-सज्जा के बीच वैश्विक सांस्कृतिक विविधता एवं समन्वयन के जीवंत मंच पर कार्यक्रम की शुरुआत गंगा हाउस के नर्तकों ने की। उन्होंने केरल की पारंपरिक और शास्त्रीय कथकली नृत्य को चीन के प्रसिद्ध फैन डांस के साथ इस खूबी से पिरोया कि पूर्वी एशिया और भारतीय संस्कृति का एक अद्भुत और विहंगम दृश्य उभरकर सामने आया। 

नेपाल के पारंपरिक मारुनी नृत्य ने मोहा सभी का मन 

वहीं दूसरी ओर, चेनाब हाउस के दल ने उत्तर भारत की शास्त्रीय नृत्य शैली कत्थक और अमेरिकी ऊर्जा से भरपूर साल्सा की तेज रफ्तार जुगलबंदी से समां बांध दिया। जमुना हाउस ने पूर्वोत्तर के लोक-शास्त्रीय मणिपुरी नृत्य को रूस के कलिनका डांस के साथ गूंथकर एक नया कलात्मक आयाम गढ़ा। इसी प्रकार, सतलज हाउस के प्रतिभागियों ने केरल के प्राचीन मोहिनीअट्टम को पड़ोसी देश नेपाल के पारंपरिक मारुनी नृत्य के साथ संयोजित कर दर्शकों की भरपूर वाहवाही बटोरी। दक्षिण भारत के भरतनाट्यम को श्रीलंका के प्रसिद्ध काड्यन नृत्य के साथ रावी हाउस के बच्चों ने जिस तन्मयता से प्रस्तुत किया, वह देखते ही बनता था। अंत में झेलम हाउस ने ओडिशा के शास्त्रीय ओडिसी नृत्य के साथ स्पेन के आवेगी और आक्रामक फ्लेमेंको की जुगलबंदी पेश कर कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। विभिन्न मापदंडों के आधार पर प्रतियोगिता में जमुना और चेनाब की टीमें संयुक्त रूप से प्रथम घोषित की गईं। गंगा और सतलज की टीमें संयुक्त रूप से दूसरे, तो झेलम और रावी टीमें साझा तौर पर तीसरे स्थान पर रहीं। निर्णायक मंडली में नीलम सिंह, प्रतिभा सिंह एवं प्रीति मिश्रा शामिल रहीं। इसके पूर्व इस कल्चरल वीक के तहत आयोजित अंतर-सदन समूह-गान में सतलज हाउस ने पहला स्थान पाया। चेनाब और झेलम संयुक्त रूप से दूसरे, तो जमुना और रावी की टीमें साझा तौर पर तीसरे स्थान पर रहीं।

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