बोकारो : शिक्षा के क्षेत्र में विगत साढ़े तीन दशक से सेवारत दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) बोकारो के प्राचार्य डॉ. अवनीन्द्र सिंह गंगवार की उपलब्धियों में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। डॉ. गंगवार ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता एवं सुलहनामा परियोजना समिति (एमसीपीसी) की ओर से मध्यस्थता की अवधारणा एवं तकनीक पर आयोजित 40 घंटे के विशेष प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूरा कर एक विशिष्ट उपलब्धि हासिल की है। 18 दिसंबर 2025 से 21 फरवरी 2026 तक हाइब्रिड मोड में चले इस गहन सत्र के उपरांत मंगलवार को विद्यालय परिवार ने इसके लिए उन्हें बधाई दी और इसे संस्थान के लिए गौरव का क्षण बताया। विद्यालय के शिक्षकों एवं कर्मचारियों ने इसे पूरे झारखंड के शिक्षा जगत के लिए एक बड़ा गौरव बताया।
अब न्यायिक विवादों के समाधान में निभाएंगे अहम भूमिका
इस प्रशिक्षण के साथ ही अब डॉ. गंगवार शिक्षाविद के साथ-साथ एक शांतिदूत की भूमिका में न्यायिक विवादों को सुलझाने में भी अपनी महती भूमिका निभा सकेंगे। एक सर्टिफाइड मीडिएटर (प्रमाणित मध्यस्थ) के रूप में भी अब वे पहचाने जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के इस प्रमाणन के साथ ही वे विभिन्न न्यायालयों (जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय या स्वयं सुप्रीम कोर्ट) के मध्यस्थता केंद्रों में पैनलबद्ध हो चुके हैं। यानी, कोर्ट खुद ऐसे मामलों को उनके पास भेज सकता है, जिन्हें आपसी बातचीत से सुलझाया जा सके। सुप्रीम कोर्ट की इस प्रतिष्ठित समिति (एमसीपीसी) के प्रशिक्षकों - इला रावत एवं राजीव ठकराल के मार्गदर्शन में प्राप्त यह दक्षता मात्र एक प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि शिक्षा और न्याय के समन्वय की नई दिशा है। आम भाषा में समझें तो मीडिएशन का मतलब है दो पक्षों के बीच के झगड़े या विवाद को बिना कोर्ट-कचहरी जाए, बातचीत और सही तकनीक से सुलझाना। सुप्रीम कोर्ट की मीडिएशन एंड कॉनसिलिएशन प्रोजेक्ट कमेटी देशभर में ऐसे एक्सपर्ट्स तैयार करती है, जो कानूनी दांव-पेंच के बजाय आपसी सहमति से समाधान निकाल सकें। अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मानकों के अनुरूप यह ट्रेनिंग इसलिए दी जाती है, ताकि विवादों को समय रहते मध्यस्थता व सुलहनामे से खत्म किया जा सके।
शिक्षा और न्याय के समन्वय से समाज में शांति का संदेश
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर डॉ. गंगवार ने सर्वोच्च न्यायालय की संबंधित समिति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे केवल एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक गंभीर जवाबदेही बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि समाज में शांति और सामंजस्य स्थापित करना है, जिसे अब वे न्याय के इस मानवीय पहलू (मध्यस्थता) के जरिए और भी सशक्त बनाएंगे। उनका मानना है कि अधिकांश विवादों का स्थाई हल कानूनी फैसलों से कहीं अधिक आपसी संवाद में छिपा होता है। उन्होंने कहा कि अपनी इस नई भूमिका के जरिए वे कड़वाहट की जगह सहयोग और विवाद की जगह विश्वास का वातावरण बनाने के लिए पूरी निष्ठा से समर्पित हो कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे।
