गीता ज्ञान यज्ञ में स्वामी तेजोमयानंद ने दिया कर्मयोग का संदेश, बोले- फल नहीं, कर्म पर रखें ध्यान


"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥" इसकी व्याख्या करते हुए आचार्य श्री स्वामी तेजोमयानंद ने कहा – कि तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, कर्म करो। फल को उद्देश्य मत बनाओ। फल भविष्य है जो अनिश्चित होता है, हमेशा चिंताग्रस्त रहोगे और कर्म करने की सामर्थ्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि एकाग्र मन से जब हम कर्म करते हैं, तब हमारी समस्त चेतना उसी कार्य में स्थित रहती है। यही एकाग्रता कर्म को सुंदर, सुसंगत तथा दिव्य बना देती है। इसीलिए अपने मन को वहीं लगाएं जहाँ आपके हाथ कार्य कर रहे हैं, फिर परिणाम देखो, कर्म उत्कृष्ट बन जाते हैं। एकाग्रता और पूर्ण रूप से शांतचित होकर काम करने से कर्म में ही शान्त आनंद का अनुभव होता है कि वह फल के प्रति इच्छा रहित हो जाता है। कभी भी स्वार्थपूर्ण काम न करें। हमेशा समर्पण भाव से काम करें। यह कभी मन में विक्षेप, तनाव, चिंता, आकुलता व अनावश्यक अपेक्षाओं को उत्पन्न नहीं होने देता है। इसलिए श्रीमद्भगवद् गीता का कहना है कि – हम सब काम का उत्थान करें, एक अचल उद्देश्य के प्रति पूर्ण एकाग्रता से कर्म करें तथा जिन कारकों पर हमारा नियंत्रण नहीं है, उनसे सम्बद्ध चिंताओं व व्यग्रताओं को समर्पित कर दें। 

कर्म का फल आपका उद्देश्य नहीं

कर्म का फल आपका उद्देश्य नहीं होना चाहिए और न ही अकर्म में आपकी आसक्ति हो। चिन्मय विद्यालय बोकारो में चिन्मय मिशन बोकारो द्वारा आयोजित गीता - पंचामृत ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन श्रोताओं की भारी भीड़ उमड़ी। मंगलवार को कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तरी छोटानागपुर प्रक्षेत्र के आईजी शैलेंद्र कुमार सिन्हा उपस्थित रहे। उनके साथ चिन्मय मिशन रांची के प्रमुख परिपूर्णानंद सरस्वती, चिन्मय मिशन गोवा के प्रमुख सुघोषानंद सरस्वती एवं चिन्मय मिशन बोकारो की आवासीय आचार्या स्वामिनी संयुक्तानंदा सरस्वती उपस्थित रही। गीता ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन सायंकालीन सत्र में आचार्यवर श्री स्वामी तेजोमयानंद महाराज ने श्रीमद् भगवद्गीता के महत्व के बारे में बताते हुए कहा कि – भगवान आदिशंकराचार्य ने भज गोविंदम में लिखा है–

भगवद्गीता के पाठ मात्र से भवपाश से मुक्ति मिलती है

परमपूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद महाराज की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि – पूने के आश्रम में परम पूज्य गुरुदेव अक्सर बच्चों के बीच गीता पाठ - प्रतियोगिता करवाते थे, एक दिन किसी ने उनसे पूछा कि – इस तरह के आयोजन का क्या अभिप्राय है? गुरुदेव ने कहा कि– "गीता पाठ से जिज्ञासा बढ़ती है, बुद्धि शुद्ध होती है, मन नियंत्रित होता है, बुद्धि तीक्ष्ण होती जाती है।" इसलिए 5000 वर्ष से अधिक हो गए परंतु आज भी गीता सर्वाधिक पढ़े जाने वाला ग्रंथ है। कल की चर्चा करते हुए कहा कि अपना विकास, अपना उद्धार मनुष्य को स्वयं करना होगा। वह स्वयं अपना मित्र भी है और शत्रु भी। उसे आत्म निरीक्षण कर अपने दुष्प्रवृत्तियों को जानना चाहिए। भगवद् ध्यान से बुद्धि को शुद्ध कर मन पर नियंत्रण रखना होगा। लेकिन कैसे हो? इसके लिए स्वामी जी ने कहा –



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