शब्द, साहित्य और संस्कृति का संगम: बोकारो में शब्द सरिता महोत्सव शुरू


कैंप टू स्थित शिबू सोरेन स्मृति भवन (टाउन हॉल) में आयोजित शब्द सरिता महोत्सव का भव्य उद्घाटन समारोह गरिमामय वातावरण में हुआ। इस अवसर पर साहित्य, शिक्षा, कला एवं संवाद का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिला, जिसने बोकारो को साहित्यिक मानचित्र पर नई पहचान दिलाने की दिशा में एक मजबूत पहल की।


इसका उद्घाटन मुख्य अतिथि विधायक श्वेता सिंह, उपायुक्त अजय नाथ झा सहित गणमान्य अतिथियों ने दीप जलाकर किया। विधायक श्वेता सिंह ने कहा कि पुस्तक से अधिक सुंदर, सच्चा और स्थायी मार्गदर्शक कोई दोस्त नहीं हो सकता। उन्होंने बच्चों और युवाओं से आह्वान किया कि वे ज्ञान के महासागर में डूबकी लगाएं, क्योंकि पुस्तकें न केवल जानकारी देती हैं, बल्कि जीवन की दिशा और दशा बदलने की क्षमता भी रखती हैं।


बोकारो की पहचान केवल स्टील सिटी तक सीमित न रहे : डीसी 

उपायुक्त अजय नाथ झा ने कहा कि बोकारो की पहचान केवल स्टील सिटी के रूप में नहीं, बल्कि एक वाइब्रेंट शहर के रूप में भी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यहां की कृषि परंपरा, समृद्ध आदिवासी संस्कृति, बच्चों की प्रतिभा और साहित्यिक चेतना बोकारो को विशिष्ट बनाती है। शब्द सरिता महोत्सव जैसे आयोजन बोकारो की बहुआयामी पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में सहायक सिद्ध होंगे। युवा वर्ग और शिक्षकों से अपील करते हुए कहा कि वे हमेशा अपने हाथ में एक पुस्तक रखें। उन्होंने कहा कि मैं स्वयं अपनी व्यस्तताओं के बावजूद एक पुस्तक साथ में रखता हूं और जब भी समय मिलता है, पढ़ने का प्रयास करता हूं। इस प्रकार की आदत समाज में पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करती है और आने वाली पीढ़ी को प्रेरित करती है।


श्रीमद् भगवद् गीता का बाल संस्करण अत्यंत उपयोगी 

वक्ताओं ने कहा कि किताबें ज्ञान को गहराई देती हैं। विशेष रूप से श्रीमद् भगवद् गीता का बाल संस्करण और महान व्यक्तित्वों की जीवनियों पर आधारित पुस्तकें बच्चों और युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। ऐसी पुस्तकें न केवल जीवन दर्शन को समझने में सहायक होती हैं, बल्कि मनोविज्ञान, आत्मबल और मानसिक पीड़ा से उबरने में भी मदद करती हैं। कार्यक्रम में डिजिटल युग में पढ़ने की आदत पर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने बताया कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में एकाग्रता की समस्या बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जब हम किताब पढ़ते हैं तो किताब हमारे हाथ में होती है, लेकिन मोबाइल का अधिक उपयोग हमें नियंत्रित करने लगता है। डॉ. विनोद कुमार ने खोरठा भाषा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसकी सामाजिक जड़ें और सांस्कृतिक पहचान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि खोरठा केवल एक भाषा नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति और अस्मिता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि मेरी मातृभाषा ही मेरी पहचान है।

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